500 साल पुरानी लोदीकालीन मस्जिद का वजूद मिटा, ऐतिहासिक धरोहर हुई मलबे में तब्दील
आगरा के सिकंदरा में करीब 500 साल पुरानी लोदीकालीन मस्जिद वर्षों की अनदेखी के बाद ढह गई। संरक्षित स्मारक न होने के कारण इसके संरक्षण और मरम्मत को लेकर प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
500 साल पुरानी लोदीकालीन मस्जिद का वजूद मिटा, दो गुंबद पहले ही ढहे; अब आखिरी गुंबद पर भी खतरा
आगरा। ताजनगरी आगरा के सिकंदरा में करीब 500 साल पुरानी लोदीकालीन मस्जिद वर्षों की अनदेखी के बाद पूरी तरह ढह गई। कभी लोदीकालीन वास्तुकला और इतिहास की गवाही देने वाली यह ऐतिहासिक इमारत अब मलबे में तब्दील हो चुकी है। हैरानी की बात यह है कि संरक्षित स्मारक नहीं होने के कारण न तो पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण की जिम्मेदारी ली और न ही समय रहते प्रशासन की ओर से कोई प्रभावी कदम उठाया गया।
सिकंदरा स्थित यह मस्जिद सुल्तान सिकंदर लोदी के शासनकाल में करीब वर्ष 1510 के आसपास बनाई गई मानी जाती है। लोदी मकबरे से लगभग 800 मीटर की दूरी पर स्थित यह मस्जिद करीब आठ फीट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर बनाई गई थी। तीन गुंबदों वाली इस मस्जिद की वास्तुकला में लोदीकालीन शैली की स्पष्ट झलक मिलती थी। इसकी मेहराब और आंतरिक डिजाइन भी बेहद खास मानी जाती थी।
बताया जाता है कि वर्ष 1985 तक मस्जिद के आसपास मिट्टी का ऊंचा टीला मौजूद था। इसके बाद लगातार मिट्टी के खनन के कारण इस ऐतिहासिक इमारत की नींव और आसपास का क्षेत्र प्रभावित होने लगा। समय के साथ मस्जिद की स्थिति लगातार खराब होती चली गई।
वर्ष 2013 में भावना एस्टेट रोड की ओर स्थित हिस्से में गुंबद के नीचे की दीवार में दरारें और गिरने की शुरुआत हुई। इसके बाद करीब दो साल पहले सितंबर में भारी बारिश के दौरान मस्जिद के दो गुंबद ढह गए। एक गुंबद बचा था, लेकिन उसमें भी चौड़ी दरारें पड़ चुकी थीं। आखिरकार संरक्षण के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर भी ढह गई।
1510 के आसपास बनी थी मस्जिद
सिकंदर लोदी ने वर्ष 1504 में आगरा में सिकंदरा को अपनी राजधानी बनाया था। इसी दौर में सिकंदरा और उसके आसपास कई महत्वपूर्ण इमारतों का निर्माण हुआ। यह मस्जिद भी उसी लोदीकालीन स्थापत्य परंपरा का हिस्सा थी और आगरा में लोदी काल की शुरुआती मस्जिदों में महत्वपूर्ण मानी जाती थी।
विशेषज्ञ बोले- संरक्षण का प्रयास होना चाहिए था
एएसआई के पूर्व अधिकारी और पुरातत्वविद डॉ. आरके दीक्षित के मुताबिक, मस्जिद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से संरक्षित नहीं थी, लेकिन इसके बावजूद इसे बचाने का प्रयास किया जाना चाहिए था। उनके अनुसार ऐसी धरोहरें लोदीकालीन वास्तुकला और इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्होंने निजी क्षेत्र और पुरातत्व के क्षेत्र में काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों से भी ऐसी विरासतों के संरक्षण के लिए आगे आने की अपील की।
वहीं, राज्य पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी ज्ञानेंद्र रस्तोगी के मुताबिक, लोदी मस्जिद राज्य पुरातत्व विभाग से संरक्षित नहीं है, इसलिए विभाग की ओर से इसकी मरम्मत नहीं कराई जा सकती। हालांकि प्रशासन चाहे तो इसके संरक्षण और मरम्मत की पहल कर सकता है।
500 साल पुरानी इस विरासत का ढहना आगरा की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। अब जरूरत है कि शहर की ऐसी कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतों की पहचान कर उन्हें समय रहते संरक्षण दिया जाए।